सीमा स्मृति का रचना संसार

पवन

बेपरवाह हँसी-सी,ये फिसली ओर ना छोर । कहे पवन छू तन और मन मेरा गगन । पवन बिन इंसान, जल बिन मीन समान। जीवन डोर…

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प्रयास

मैं कोई गुजारा लम्‍हा नहीं जिसे भुलाने की कोशिश हो मैं इक सच हूँ मैं इक यथार्थ हूँ कोई सपना नहीं जो सुबह हो धुँधला…

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एतबार

क्‍यों,कलम हाथ आते ही खो जाते हैं शब्‍द उन साथियों की तरह जो खो गए मात्र अपनत्‍व का दे एहसास। क्‍यों, अभिव्‍यक्ति की छटपटाहट गुजरे…

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फ़ासले

कुछ यथार्थ तुम्‍हारे हैं कुछ यथार्थ मेरे फिर कुछ हैं ---- हमारे यथार्थ में । तुम चलते रेगिस्‍तान में मेरे कदम सागर की रेत पर…

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रहस्‍य

हर क्षण होठों पर सिमटी मुस्कराहट के पीछे क्या आपने देखी है- बनावट की मोटी परत क्या महसूस की है, चुभती कड़वाहट दर्द की एक…

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