सीमा स्मृति का रचना संसार

पैबंद

कब तलग जोड़ते, सहेजते रहोगे वो पैबंद, जो लगाये थे तुमनें मेरी जिन्‍दगी में प्‍यार के नाम पर । तुम जीते रहे जिन्‍दगी, कैद मैं…

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रेखा

जिन्‍दगी की किताब के पृष्‍ठ बदलते रहे उन पर अंकित गहरी काली रेखाएँ कुछ अमिट तनिक सिमट कहती रही कहानी जिन्‍दगी की। सुना तो था…

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.साथी

जिन्‍दगी करती है सवाल मुझसे क्‍या है गम और है क्‍या खुशी ? अतल सागर में तलाशता है क्‍यों कोई निधि प्रश्‍न लहरो से उठते…

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इंतजार

तपते दिन और बेचैन रातें तन्हा सफर । थमें या बहें पलकों पर रुके अश्क ये कहें । टूटे ये तार हैं जख्मी अख्तियार सोखते…

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