सीमा स्मृति का रचना संसार

‘मूक’

स्‍पर्श केवल, अंघकार की जबान नहीं, यह भाषा है, प्रत्‍येक जीवन की भट्टी के अंगारो की तरह उकेरा है हर स्‍पर्श से पूर्व ‘जिन्‍दगी’ ने…

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कपड़े

ऐस्‍सी कार के रंगीन शीशों से झांकती दो आंखे, फेर लेती हैं मुहँ चिलचिलाती धूप में, देख अर्धनग्‍न लड़की को मांगते भीख । छी वट…

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ओस सा अस्तित्‍व

ओस की बूंद-सा अस्तित्‍व सूर्य किरण में सिमटता चन्‍द्र किरण से खिलता ये अस्तित्‍व के धरातल पर ओस-सा अस्तित्‍व चाहा बहुत ना सूर्य का अपनतत्‍व…

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