सीमा स्मृति का रचना संसार
अनिश्चित
कैसे बनेगें हम किसी के जीने का मकसद दोस्त निश्चित है मकसद की डोर तेरी मेरी सोच से भी कहीं आगे। सीमा स्मृति
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वक्त
कभी ख़ामोशी लगती है जुबां प्यार की कौन जाने, कब बन जाये सज़ा प्यार की । सीमा स्मृति
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