सीमा स्मृति का रचना संसार
प्रतिबिम्ब
वो आया था मेरी जिन्दगी की सिलवटें पढ़ने देख आईना नि:शब्द लौट गया। सीमा स्मृति
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पहचान
देख ये है हैवानियत कुदरत भी है हैरान क्या मैंने ही बनाया था इंसान अपनी ही नस्लों को करता बर्बाद किस मुहँ से खुद को…
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मुलाकात
तुझसे मिलना इक रवायत नहीं किसी उम्र का महकता सुरूर भी नहीं बदली हवाओं में थमा सा कोई नशा भी नहीं । तुझ से मिलना…
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कोहरा
क्यों पनपने लगती है वो बेल, हमारे भीतर ले कोहरे की छुहन । काटते रहे हर बार टुकड़ा टुकड़ा करते बेल जो पनपती हमारे भीतर…
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