सीमा स्मृति का रचना संसार

पहचान

देख ये है हैवानियत कुदरत भी है हैरान क्‍या मैंने ही बनाया था इंसान अपनी ही नस्‍लों को करता बर्बाद किस मुहँ से खुद को…

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कोहरा

क्‍यों पनपने लगती है वो बेल, हमारे भीतर ले कोहरे की छुहन । काटते रहे हर बार टुकड़ा टुकड़ा करते बेल जो पनपती हमारे भीतर…

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