सीमा स्मृति का रचना संसार

“खोज”

मिश्री से मीठे, निबोरी से कड़वे, कैक्‍टस से कटीले, फाहे से सोखते दर्द, रेत से सरकते, दलदल से खींचते, दिन से उजले, अमावस्‍या की रात…

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साथ

यूँ तो अपनी परछाई भी छोड़ देती है साथ, बिना रोशनी के कौन रहता है, हर लम्‍हा किसी के साथ, खोजती मैं, जिन्‍दगी हर लम्‍हें…

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साथ

‘साथ’ वादों से नहीं इरादों से बना करते हैं इरादे विश्‍वास में झलका करते हैं दोस्‍तों विश्‍वास किया नहीं जाता दिया जाता है। सीमा स्‍मृति

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जीवन

देखे हैं तेरी खुशी में, तितलियों के पंखों से रंग । सुनी है मैंने तेरी खुशी में, भँवरों की गुनगुन मैं जानने लगी हूँ अस्तित्‍व…

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