वसन्त
प्रसन्न मन प्रफुल्लित है तन, आया वसन्त। मन के तार बिना साज के राग छाया वसन्त महके फूल तितली चूमे होंठ भँवरे गाएँ। धुन बजती…
रचना पढ़ें : वसन्त
प्रसन्न मन प्रफुल्लित है तन, आया वसन्त। मन के तार बिना साज के राग छाया वसन्त महके फूल तितली चूमे होंठ भँवरे गाएँ। धुन बजती…
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1 कुछ खट्टा ये कुछ मीठा बीता है गया वर्ष रे। 2 हर्षित मन नई उम्मीदों -संग भरेगा रंग। 3 नव संकल्प सूर्य-किरन लाई धरा…
रचना पढ़ें : नव वर्ष-2014
कांपी धरती पिघला आसमान मूक इंसान। टूटा घरौंदा बिखरा है सामान कैसी पहचान। रौंदी धरती भूले हैं परिणाम अब हैरान। वीरान बस्ती सहमी है धरती…
रचना पढ़ें : कांपी धरती
दुख बादल सुख उड़ता पंछी यात्रा अनंत। युगों युगों से ढूढ़ता मुसाफिर कहॉं मंजिल। दुखी रहना प्रवृत्ति है मन की ना हो आवृत्ति। दुःख में…
रचना पढ़ें : युगों युगों से
भावों का रेला किसने क्या-क्या ठेला वक्त ने कहा। गीत -संगीत बजाते गए मीत नयी दिशा में। उनींदी आँखें देखना चाहती हैं खिली-सी धूप। थामें…
रचना पढ़ें : उनींदी आँखें
तन की नहीं, मन की शक्ति के ही ये हैं पुजारी। दया न माँगे, न सहानुभूति हीं, दे दो दुलार। मुस्कराते वो ले संघर्ष-मशाल मंजिल…
रचना पढ़ें : पूर्णता की ओर
देखो आईना करो सवाल, क्यों है ये भ्रष्टाचार। शब्दों से नहीं पाटी जाए बीमारी ये लाइलाज। वायरस ये करे जड़ें खोखली ध्वस्त समाज। ये दलदल…
रचना पढ़ें : भ्रष्टाचार
यशोदा कहो, या पुकारो देवकी इक रूप -सी । है कभी ढाल, कभी तलवार उर विशाल । ममता– छाँव है शीतल चाँदनी भरे है घाव।…
रचना पढ़ें : ममता