- वक्त की धार
बन कटार
शब्दों के टुकड़े करती रही
स्याही क्या लिखेगी
हाइकु कहानी कविता
एहसास के पन्नों पे
हर स्याही रंग बदलती रही । - परत दर परत
दीवार पे पेन्ट चढ़े से -ये रिश्ते
बदले मौसम में
झर जाते हैं
पपड़ी बन -बन। - अंदर का मैं —–शब्द जाल बना सिर्फ
मिमियता है
लोग इसे जीवन कहते हैं। - अभी कुछ कर्ज बाकि होंगे सॉंंसों के
वरना–
लबों की हँसी
यूँ टुकड़ों में ना मिलती


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