पूर्णता की ओर

  1. तन की नहीं,

    मन की शक्ति के ही

    ये हैं पुजारी।
  2. दया न माँगे,

    न सहानुभूति हीं,

    दे दो दुलार।
  3. मुस्‍कराते वो

    ले संघर्ष-मशाल

    मंजिल पार।
  4. लब खामोश

    सफर तन्‍हा सही

    जीतेगें जंग।
  5. नहीं बजती

    कानों में कोई धुन

    बोलती आँखे।
  6. रोशनी दूर

    हौंसले हैं बुंलद

    मंजिल पास।
  7. अस्फुट शब्‍द

    कह डालते बात

    भावों के भरी।
  8. विकट स्थिति

    लाँघते चले जाते

    आशा के संग।
  9. संघर्ष-ताल

    थामे आशा का हाथ

    थिरकते वो।
  10. मुस्‍कराहट

    समेटे होठों पर,

    प्रेरणा स्रोत।
  11. सोच है ऊँची

    पहाड़ों-से इरादे

    ये बेमिसाल।
  12. स्‍वीकृति नहीं

    समाज की आँखों में,

    बाँटते प्‍यार।

पाठक समुदाय

रचनाओं से जुड़े रहें।

पाठक समुदाय की जानकारी आ रही है…

    अपनी इच्छा से सार्वजनिक हुए पाठक यहाँ दिखेंगे।

    जुड़ने से आपका नाम सार्वजनिक नहीं होता। सूची में दिखना आपकी अलग सहमति पर निर्भर है।

    Google से प्रवेश करने पर आपका नाम, ईमेल और खाता पहचान सुरक्षित रूप से इस वेबसाइट के खाते से जुड़ते हैं। Google की प्रवेश सुविधा और आपकी चुनी हुई सार्वजनिक तस्वीर Google से लोड होती हैं। गोपनीयता नीति

    अपनी प्रतिक्रिया लिखें

    आपकी बात इस रचना को एक नया अर्थ दे सकती है। ईमेल सार्वजनिक नहीं होगा। * वाले स्थान भरना ज़रूरी है।

    स्वीकृत प्रतिक्रिया के साथ आपका नाम और उपलब्ध प्रोफ़ाइल चित्र सार्वजनिक होंगे। यह पाठक सूची में नाम दिखाने की सहमति से अलग है।