क्यों पनपने लगती है वो बेल, हमारे भीतर ले कोहरे की छुहन । काटते रहे हर बार टुकड़ा टुकड़ा करते बेल जो पनपती हमारे भीतर लिजलिजी केंचुए सी, जिददी आक्टोपस सी, गिरगट से रंग बदलती, बढ़ती बे-खौफ हर पल कभी कभी मुस्कराती पूछती अनेक सवाल और डाल कोहरे की चादर जकड़ती पूरा अस्तित्व वो बेल जो पनपती हमारे भीतर। सीमा समृति


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