एतबार

तुम भी कहते रहे, हम भी कहते गए

रिश्‍ता हमारे बीच अब कुछ भी नहीं

फिर क्‍यों धड़कने लगता है दिल

जब भी तस्‍वुर में उतरने लगती है तुम्‍हारी तस्‍वीर

तुम भी कहते रहे, हम भी कहते गए

रिश्‍ता हमारे बीच अब कुछ भी नहीं

तुम कुछ कहते नहीं हम भी बोल पाते नहीं

फिर क्‍यों तन्‍हाईयों में,बोलती हमारी खामोशियां

तुम भी कहते रहे, हम भी कहते गए

रिश्‍ता हमारे बीच कुछ भी नहीं

बढती गई दूरियां नजरों के बीच

फिर किस तरह, पुल उम्‍मीद का हम, तय कर गए

तुम भी कहते रहे, हम भी कहते गए

रिश्‍ता हमारे बीच अब कुछ भी नहीं

कब रिश्‍ता -ए-दर्द “एतबार” बन गया

ना तुम जान पाए ना हम समझ सके 

तुम भी कहते रहे, हम भी कहते गए

रिश्‍ता हमारे बीच  अब कुछ भी नहीं

सीमा ‘स्‍मृति’

पाठक समुदाय

रचनाओं से जुड़े रहें।

पाठक समुदाय की जानकारी आ रही है…

    अपनी इच्छा से सार्वजनिक हुए पाठक यहाँ दिखेंगे।

    जुड़ने से आपका नाम सार्वजनिक नहीं होता। सूची में दिखना आपकी अलग सहमति पर निर्भर है।

    Google से प्रवेश करने पर आपका नाम, ईमेल और खाता पहचान सुरक्षित रूप से इस वेबसाइट के खाते से जुड़ते हैं। Google की प्रवेश सुविधा और आपकी चुनी हुई सार्वजनिक तस्वीर Google से लोड होती हैं। गोपनीयता नीति

    अपनी प्रतिक्रिया लिखें

    आपकी बात इस रचना को एक नया अर्थ दे सकती है। ईमेल सार्वजनिक नहीं होगा। * वाले स्थान भरना ज़रूरी है।

    स्वीकृत प्रतिक्रिया के साथ आपका नाम और उपलब्ध प्रोफ़ाइल चित्र सार्वजनिक होंगे। यह पाठक सूची में नाम दिखाने की सहमति से अलग है।