शीर्षक रहित रचना

उत्‍तर

शोर सुन

नींद से जागी आंखे

हैरान हो फैल जाया करती थी 

देख 

सुबकती मां के शरीर पर पडे

नीले हिस्‍सों

और

पिता के डगमगाते कदमों,

तने चेहरे को ।

तेल लगाती, सहलाती

खामोश अनगिनत प्रश्‍न,

पूछा करती थी वो मां से ।

आज

अनुतरित मां का वही चेहरा

उत्‍तर बन

उसकी आंखों में सिमट आता है

प्रश्‍नों का वही सैलाब

उसकी बेटी की आंखों में

उतर आता है।

सीमा ‘स्‍मृति’

1 प्रतिक्रियाएँ

  1. उमेश महादोषी

    blog par aapaki sabhi rachanayen padin. achchhi lagin. laghukatha men sansad ki bachchon ke man men ubharati pahachan nishchay hi samaj ke liye chinta ka vishay hai.

पाठक समुदाय

रचनाओं से जुड़े रहें।

पाठक समुदाय की जानकारी आ रही है…

    अपनी इच्छा से सार्वजनिक हुए पाठक यहाँ दिखेंगे।

    जुड़ने से आपका नाम सार्वजनिक नहीं होता। सूची में दिखना आपकी अलग सहमति पर निर्भर है।

    Google से प्रवेश करने पर आपका नाम, ईमेल और खाता पहचान सुरक्षित रूप से इस वेबसाइट के खाते से जुड़ते हैं। Google की प्रवेश सुविधा और आपकी चुनी हुई सार्वजनिक तस्वीर Google से लोड होती हैं। गोपनीयता नीति

    अपनी प्रतिक्रिया लिखें

    आपकी बात इस रचना को एक नया अर्थ दे सकती है। ईमेल सार्वजनिक नहीं होगा। * वाले स्थान भरना ज़रूरी है।

    स्वीकृत प्रतिक्रिया के साथ आपका नाम और उपलब्ध प्रोफ़ाइल चित्र सार्वजनिक होंगे। यह पाठक सूची में नाम दिखाने की सहमति से अलग है।