सीमा स्मृति
- ये सिलसिला
खौफ के घने साए
बढ़ते चले जाएँ,
माँ- बेटी -बहू
हर दिल पे छाएँ
काश ऐसा हो जाए। - वो नाजो पली
काम पर थी चली
बाधाएँ रोज़ मिलीं,
पार न पाए
हर ओर दानव
कैसे लाज बचाए। - हर शहर
दरिन्दे हैं घूमते
जाल हैं बिछाते,
क्यों मैं बेटी हूँ
रोज देते हैं घाव
देवी कह सताते ।
त्रिवेणी में प्रकाशित मेरा पहला सदोका हिमांशु भाई साहब को हार्दिक धन्यवाद


पाठक समुदाय
रचनाओं से जुड़े रहें।
पाठक समुदाय की जानकारी आ रही है…
Google से प्रवेश की सुविधा अभी तैयार की जा रही है। आप सामान्य टिप्पणी फ़ॉर्म का उपयोग कर सकते हैं।
सामान्य प्रवेश
अपनी इच्छा से सार्वजनिक हुए पाठक यहाँ दिखेंगे।
जुड़ने से आपका नाम सार्वजनिक नहीं होता। सूची में दिखना आपकी अलग सहमति पर निर्भर है।
Google से प्रवेश करने पर आपका नाम, ईमेल और खाता पहचान सुरक्षित रूप से इस वेबसाइट के खाते से जुड़ते हैं। Google की प्रवेश सुविधा और आपकी चुनी हुई सार्वजनिक तस्वीर Google से लोड होती हैं। गोपनीयता नीति